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waste-pickers & environmental groups say, waste incinerators anti-worker & anti-health

Written By Krishna on Tuesday, December 20, 2011 | 10:15 AM


Indian waste is not suitable for energy generation because of huge inert matter component and compostable matter. Incineration of waste is anti-environment, anti-labour and anti-public health. Ongoing construction work for the hazardous waste to energy plant in Okhla despite a case against it in Delhi High Court is an invitation for public health disaster, said Gopal Krishna, convener, ToxicsWatch Alliance (TWA). TWA disapproved of waste picker organizations that betray workers cause by floating companies for ewaste trade and for signing MoU with Coca Cola company.

He was speaking at a press conference organised by All India Kachra Shramik Mahasangh (AIKSM), an organisation of waste-pickers that has been active for the past 8 years in Delhi, Jharkhand, Uttrakhand and Uttar Pradesh. AIKSM is organizing its Delhi state conference on 22nd December 2011 at Gandhi Darshan. The objective of the state conference is to reorganise the waste-pickers affiliated with AIKSM in order to evolve a strategy to tackle the ongoing process of corporatisation of Municipal Solid Waste (MSW) and upcoming waste to energy plants in Delhi as both these initiatives of the Delhi government are severely impacting the livelihood of waste-pickers in the city.

Delhi government has decided to hand over the responsibility of handling solid waste to private companies under public-private partnership (PPP). These companies have been given contract for collection, segregation and disposal of waste in 12 different zones of the city. These companies have also been allotted a concession period of 9 years inclusive of the implementation period of 12 months from the date of signing the contract. Alongside the coporatization of MSW, the Municipal Corporation of Delhi has signed a MoU with Jindals Ecopolis for the construction of waste to energy plants in Timarpur and Okhla. The waste to energy plant would use incinerator technology to generate 20 MW of energy from Delhi’s solid waste. The company gets a subsidy of Rs. 2 crore for the production of each MW of electricity. The plant is ready and expected to start its production soon. Similar types of two other plants are under construction in Narela-Bawana and Gazipur through public private participation (PPP). It is estimated that after all these 3 plants would be functional they will require approximately 7300 MT of waste to produce the projected amount of energy leaving only about 1200 MT of waste to share between private contractors and waste-pickers.

The waste-pickers access to waste was stopped when the corporatization of MSW started in Delhi in 2005. Waste-pickers mainly collect and segregate waste and sell the recyclables before it is taken to the landfill sites. Even though waste-pickers faced different types of challenges, such as police threatening, health hazards and social insecurity etc., they were able to access waste to secure their livelihood. The three proposed waste to energy plants will destroy the livelihood of some 3.5 lakh waste pickers, Dharmendra Yadav, General Secretary, All India Kachra Shramik Mahasangh (AIKSM).

The AIKSM’s Delhi state conference will initiate a fresh struggle against these two initiatives, and also commits to develop an alternative decentralized solid waste management in Delhi, which would be sustainable both from the point of view of waste-pickers and environment in the city, said Sadre Alam, a researcher working with unorganized sector workers.

टौक्सिक वाच एलाइंस के कनवेनर गोपाल कृष्ण ने कहा कि हमारे देश में जो कचरा निकलता है उस से बिजली पैदा नहीं की जा सकती क्योकि उस में अधिक मात्रा में बालू और खादय पदार्थ हैं। उनके मुताबिक कूड़े से बिजली बनाने का यह प्लांट केवल सरकार द्वारा मिलने वाली अनुदान को प्राप्त करने के लिए किया जा रहा है, खुद सरकार के अन्दर इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं है। 1993 में जो प्लांट तीमार पुर में लगाया गया था वह केवल 7 दिन ही चला था।

गोपाल कृष्ण आल इंडिया कचरा श्रमिक महासंघ द्वारा आयोजित संवाददाता सम्मेल्लन में बोल रहे थे. महासंघ कूड़ा चुनने वाले मजदूरों का एक संगठन है जो पिछले 8 सालों से इस मुद्दे पर काम करता आ रहा है। संगठन का मुख्य काम दिल्ली में होने के साथ साथ झारखण्ड, उतराखंड एवं यू.पी. में भी फैलाने की कोशिश चल रही है।

कूड़ा चुनने वाले मजदूरों की जीविका को नजरअन्दाज करते हुए सरकार ने कूड़े कचरे को भी कम्पनियों के हाथों में सौंपने का फैसला किया है, साथ ही साथ कूड़े को जला कर बिजली बनाने का भी पलांट भी लगा रही है जिस से पर्यावरण का नुकसान होगा।

मजदूरों की जीविका एंव पर्यावरण की रक्षा को ध्यान में रखते हुए संगठन का दिल्ली राज्य सम्मेलन 22 दिसम्बर 2011 को गांधी स्मृति एंव दर्शन समिति (निकट राज घाट) में आयोजित होने जा रहा है। इस सम्मेलन का मकसद कचरा चुनने वाले मजदूरों को लामबन्द करते हुए सरकार का कूड़े से बिजली बनाने की योजना का विरोध करना है, ताकि कचरा चुनने वाले मजदूरों की जीविका बचाई जा सके एंव साथ साथ पर्यावरण का नुकसान होने से भी बचाया जा सके।

सरकारी ऐसा अनुमान के मुताबिक दिल्ली में 8500 मेट्रिक टन कूड़ा हर दिन निकलता है, इसे ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी एम सी डी, एन डी एम सी एंव कन्ट्रोनमेन्ट बोर्ड की है। शोध एंव सर्वे से यह बात बार बार सामने आती रही है कि सरकारी कर्मचारी अपना काम ठीक से नहीं करते जिस कारण कूड़ा नालों को जाम करता है एंव बरसात में जल निकासी की समस्या सामने आती है। यह अन्दाजा लगाया गया है कि दिल्ली में लगभग 3.5 लाख कूड़ा चुनने वाले मजदूर हैं जो इन कूड़ों को चुन कर उसकी छटाई करते हैं एंव अपनी जीविका इसी को बेचकर चलाते हैं। अगर वह ऐसा न करें तो यह सभी रीसाईकिल होने वाले कूड़ों को भी गाजीपुर, भलस्वा एंव ओखला लैंडफिल साईट में सरकारी कर्मचारियों के द्वारा डाल दिया जाएगा। कूड़ा चुनने वाले मजदूर ऐसा कर न केवल अपनी जीविका चलाते हैं बल्कि पर्यावरण को भी खराब होने से बचाते हैं, इस दौरान इन्हें तरह तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। न केवल स्वास्थ्य की दिक्कत बल्कि पुलिस भी परेशान करती है साथ ही साथ समाज भी इन्हें गन्दी नजरों से देखता है। यह वह मजदूर हैं जिन्हें किसी भी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा भी सरकार से प्राप्त नहीं।
दर असल कूड़ा चुनने वाले मजदूरों के सामने परेशानी तब शुरु हुई जब 2005 में इन्हें कूड़ा चुनने से रोका जाने लगा, सरकार ने पी पी पी के तहत यह जिम्मेदारी कम्पनियों को सोंप दी। इन कम्पनियों को दिल्ली के 12 जोनों के कूड़े चुनने, छांटने एंव ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी सोंपी गई। 10 साल के इस करार में उन कम्पनियों को 12 महीने की छूट भी दी गई हैै। एम् सी डी ने जिन्दल कम्पनी के साथ तीमार पुर और ओखला में कूड़े से बिजली बनाने का प्लांट लगाने के लिए एक एम ओ यू साईन किया। कूड़े से बिजली बनाने का यह प्लांट जलन पद्धति द्वारा दिल्ली के कूड़े कचरे से 20 मेगा वार्ड बिजली पैदा करेगा।
इस काम के लिए सरकार से इन कम्पनियों को हर एक प्लांट लगाने के लिए 2 करोड़ का अनूदान भी दिया। यह प्लांट तैयार हो चुका है एंव सरकार इसे जल्द शुरु करने की फिराक में है। इसी तरह के 2 और प्लांट नरेला-बवाना एंव गाजीपुर एंव में भी पी पी पी के तहत बनाये जा रहे हैं। अनुमानित है कि जब यह सभी प्लांट काम करने लगेंगे तब इसके लिए 7300 मेट्रिक टन कूड़े की जरुरत होगी एंव कुल 8500 मेट्रिक टन कूड़े में से 1200 मेट्रिक टन ही इन मजदूरों के लिए बच पायेगा। एक शोध के मुताबिक यह भी पता चला है कि सरकार के इस कदम से न केवल इन कूड़ा चुनने वालों की जीविका मारी जाएगी बल्कि इस से जहरीली गैस भी निकलेगी जिससे पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होंगे, जो कैंसर का कारण बनेगा।

आॅल इंडिया कचरा श्रमिक महासंघ इन दोनों पहलूओं के मद्देनजर 22 दिसम्बर 2011 को 10 बजे दिन से गांधी स्मृति एंव दर्शन समिति में आयाजित राज्य सम्मेलन में आगामी संघर्ष की रुपरेखा तय करेगा।

प्रेस को सम्बोधित करते हुए महासचिव धर्मेन्द्र ने कहा कि आज राजघानी का मजदूर बहुत बुरे वक्त से गुजर हा है, अगर मजदूरों को कूड़ा चुनने से रोका गया तो लाखों मजदूर बेरोजगार हों, संगठन ऐसा होने नहीं देगा।

असंगठित क्षेत्र के मुददे पर काम करने वाले सदरे आलम ने कहा कि आने वाले दिनों में कूड़े को मैनेज करने की वैकल्पिक पद्धति भी तैयार करेने की जरुरत है ताकि मजदूरों की जीविका भी बची रहे एंव पर्यावरण भी दुषित न हो, इसके लिए सामाजिक मुददों पर शोध करने वाले कार्यकर्ताओं को आगे एंव इन मजदूरों को सहयोग देने की जरुरत है।

प्रेस को सम्बोधित करते हुए बाल विकास धारा के अध्यक्ष देवेन्द्र ब्राल ने कहा कि सरकार जान बूझ कर मजदूरों को परेशान करने के लिए कूड़े को निजि कम्पनियों के हाथें में सौंप रही है, इस से शहर के गरीब मजदूर और भी बेहाल हो जायेंगे।
झुग्गी झोपड़ी एकता मंच के अध्यक्ष जवाहर सिंह ने कहा कि यह सभी कूड़ा चुनने वाले मजदूर झुग्गी वासी ही हैं, सरकार अपना फैसला वापस ले अन्यथा मिलकर संघर्ष किया जाएगा।

संगठन के अघ्यक्ष थानेश्वर दयाल ने इन मजदूरों को वह सब हक देने की मांग की जो सरकार असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को देने की बात बिल में ला रही है। उन्होंने सभी को सम्मेलन में शामिल होने की अपील की।
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